Qudrat Ullah Shahab

In 1961 Qudrat Ullah Shahab क़ुदरत उल्लाह शहाब (1917 – 1986) wrote a Urdu novella ‘’Ya Khuda’’ (या ख़ुदा , Oh God !) on the aftermath of India-Pakistan Partition of 1947. ‘Ya Khuda’ is a powerful & moving story of a woman named Dilshaad who was made to leave her Village Chamkor in Eastern Punjab after much agony to the newly created Pakistan. Upon reaching the western Punjab, contrary to her hopes, this part of the country was no less brutal, lusty and exploiting than the one she had fled.
Here is an excerpt from the novella published in Urdu.

कराँची के ईदगाह के मैदान में एक मीनाबाज़ार लगा हुआ था। टाट के छोटे-छोटे झोंपड़ों में नन्हे-नन्हे चिराग़ टिमटिमा रहे थे। एक अजीब क़िस्म का इत्मिनान यहाँ के माहौल पर छाया हुआ था, जिसे देखकर यह महसूस होता था कि ज़िन्दगी का यह भटका हुआ कारवाँ आख़िर अपनी मंज़िल-ए-मकसूद पर पहुँच गया है।
एक झोंपड़ी में चादर तान के दो हिस्से किये हुए थे। सामने दिलशाद पकौड़ियाँ तल रही थी। पिछली ओर जुबेदा दही-बड़े लगाए बैठी थी।
एक लम्बा तगड़ा पठान पकौड़ियों के सामने पालथी मारे बैठा था।

”गर्म-गर्म पकौड़ियाँ, ख़ान, खा लो, कितनी दूँ?”

”नर्म है, ख़ूब गर्म है?” पठान ने आँख मारी।

”हाँ पठान, नर्म है, ख़ूब गर्म है!” दिलशाद कड़छी मुँह के सामने करके मुस्करायी।

दिलशाद की मुस्कराहट में भी अजीब जादू था। उसकी एक मुस्कराहट पर निसार होकर रहीम ख़ाँ ने कसम खायी थी कि अगर सूरज या चाँद-तारे भी उसे उठा ले जाएँ तो वह धरती-आकाश के फैलाव को भी फाँदकर उसे छीन लाएगा।

पठान ने होंठों पर जबान फेरी, ”ख़ूब, एक रुपया?”

”नहीं ख़ान, पाँच रुपया!”

”हट ख़ू ढाई।”

”ख़ू, पाँच”

पठान ने अपनी जेब के पैसे गिने। उसके पास तीन रुपये चार आने थे। बाकी उधार करने चाहे। लेकिन दिलशाद ने उसे मजबूर कर दिया कि, ”ख़ान, कर्ज़ मोहब्बत की कैंची है, तुम पूरे पैसे लेकर आओ। मैं तुम्हें झट नर्म-नर्म, गर्म-गर्म पकौड़ियाँ उतार दूँगी।”

पठान मायूस होकर दूसरी तरफ़ चला गया। वहाँ उसने दहीं-बड़ों का सौदा किया। ज़ुबेदा अभी बच्ची थी, नादान थी। इसलिए वह एक रुपये बारह आने का उधार मान गयी।

ज़ुबेदा ने दिलशाद को आवाज़ दी, ”बहन, ज़रा इधर ध्यान देना। छोटा भाई महमूद सो रहा है। मैं ज़रा ख़ान के साथ जाकर दही ले आऊँ।’