• अभिषेक अवतंस


मैं साहित्यकारों, लेखकों और प्रोफ़ेसरों के बीच बड़ा हुआ हूँ। एक बात मैंने देखी है कि 60–65 वर्ष की आयु पार करने के बाद भारत में लगभग हर वह व्यक्ति, जिसका किसी ठीक-ठाक पेशे से वास्ता रहा हो, पुरस्कार पाना चाहता है,चाहे उसके लिए उसे अपनी जेब से पैसे ही क्यों न खर्च करने पड़ें।

जहाँ तक मैं जानता हूँ, भारत के कई छोटे शहरों में कुछ लोगों ने बड़े-बड़े व्यक्तियों के नाम पर पुरस्कार देने वाली संस्थाएँ खोल रखी हैं। इन संस्थाओं के कर्ताधर्ता लोगों को पुरस्कार देने के लिए पत्र या ईमेल लिखते हैं कि, “आपको इस वर्ष का ‘धर्मराज-युधिष्ठिर सम्मान’ देने का निर्णय लिया गया है।”

कई लोग पुरस्कार बाँटकर इस क्षेत्र में अपना पीआर बढ़ाते हैं। मसलन, लेखकों को पुरस्कार बाँटकर लेखकों के बीच पैठ बनाते हैं, भले ही वे स्वयं घासलेटी कविताएँ लिखते हों; डॉक्टरों को पुरस्कार बाँटकर डॉक्टरों में पैठ बनाते हैं, भले ही वे स्वयं झोला-छाप डॉक्टर हों।

समाजसेवा के लिए भी पुरस्कार दिए जाते हैं, जिनके सबसे पहले दावेदार नेता-टाइप के लोग होते हैं। इन पुरस्कारों को आमतौर पर छुटभय्ये नेता या व्यवसायी-टाइप के लोग बाँटते हैं। पुरस्कारों के नाम भी बहुत भारी-भरकम होते हैं,जैसे भारत रत्न की तर्ज पर “हिंदुस्तान रत्न” या पद्मश्री की तर्ज पर “कर्णधार श्री”।

भारत में विदेशी पुरस्कारों का विशेष महत्व है। कई पुरस्कार बाँटने वाले एक कदम आगे जाकर थाईलैंड, श्रीलंका, कंबोडिया, वियतनाम, नेपाल, मलेशिया, यहाँ तक कि लंदन या सिंगापुर में भी ये पुरस्कार समारोह आयोजित करते हैं। इस तरह के आयोजनों के लिए किसी ट्रैवल एजेंसी के साथ साझेदारी की जाती है। जिन देशों में भारतीयों को वीज़ा आसानी से मिल जाता है, वहाँ पुरस्कार लेने के इच्छुक लोगों को आमंत्रित कर उन्हें उनके अपने खर्चे पर ले जाया जाता है। प्रति व्यक्ति लगभग ढाई लाख से तीन लाख रुपये लेकर उनके आने-जाने और रहने का प्रबंध किया जाता है।

इस तरह 25–30 लोगों का एक समूह बनाकर उन्हें पटाया (थाईलैंड) की गलियों में घुमाया भी जाता है और इसी बीच, जिस होटल या रिज़ॉर्ट में वे ठहरे होते हैं, उसी के कॉन्फ़्रेंस रूम में “अखिल विश्व दानवीर कर्ण संस्था” द्वारा पुरस्कार-वितरण समारोह भी आयोजित कर दिया जाता है। शाम को कविता-पाठ और नृत्य-संगीत सभा का आयोजन भी होता है, जिसमें ऊबाऊ कवि अपनी कविताएँ सुनाते हैं और कल तक अपने घर की रसोई में गीत गाने वाली गायिकाएँ अपनी कर्कश आवाज़ से ही सही, समाँ ज़रूर बाँधती हैं। पुरस्कार-वितरण की अनेक तस्वीरें और वीडियो संस्था के फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पेज पर प्रकाशित किए जाते हैं, ताकि इन्हें दिखाकर अगले साल के प्रतिभागियों को फँसाया जा सके।

कुछ साल पहले यहाँ हॉलैंड में मुझसे देहरादून की एक संस्था ने संपर्क किया था। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने ‘Emeralds of India–कीर्ति सम्मान’ का आयोजन हेग, हॉलैंड में करने का फैसला किया है। मुझसे संपर्क इसलिए किया गया था ताकि मैं उनके स्थानीय मेज़बान की भूमिका निभाऊँ। इसके बदले मुझे भी “महामना सम्मान” देने का वादा किया गया था।

मैंने कहा कि मैं व्यस्त हूँ और साथ ही पूछा कि इतने सारे लोगों को शेंगेन वीज़ा (यूरोपीय देशों का वीज़ा) कैसे मिलेगा। उन्होंने कहा, “आप चिंता न करें। सभी पुरस्कार प्राप्तकर्ता सेवानिवृत्त लोग हैं और सबको अच्छी पेंशन मिलती है। उनका बैंक बैलेंस अच्छा है, उनके पास ज़मीन-जायदाद वगैरह है, इसलिए उन्हें वीज़ा मिल जाएगा।”

बाद में पता चला कि वे प्रत्येक प्रतिभागी से तीन लाख रुपये ले रहे थे। संचालकों ने यह भी कहा कि यदि मैं उनसे जुड़ूँ, तो वे अपनी पुरस्कार संस्था का यूरोप चैप्टर भी शुरू कर सकेंगे। मैंने कहा, “यह मेरे बस का नहीं है। माफ़ कीजिए।”

इस तरह विदेश में पुरस्कार पाने के लिए कई भारतीय लोग अच्छी-खासी रकम खर्च करने को तैयार मिलेंगे। मान लीजिए कि आप अभी एक संस्था खोलें और घोषणा करें कि आप सेवानिवृत्त बैंक मैनेजरों को ‘Rashtriya Banking Excellence Puraskar’ देंगे तथा इसका समारोह मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुइस में आयोजित किया जाएगा। प्रति व्यक्ति चार लाख रुपये देने होंगे। आप देखेंगे कि न जाने कितने लोग यह पुरस्कार लेने आपके पास आ जाएँगे।

मुझे लगता है कि यह धंधा बहुत फ़ायदे का है। कई लोगों को ऐसे पुरस्कारों की लत तक लग जाती है। मुझे लगता है कि जब तक व्यक्ति काम कर रहा होता है, तब तक अपनी संस्था में उसे न तो पर्याप्त प्रशंसा मिलती है, न उत्साहवर्धन। इसलिए जीवन के आख़िरी पड़ाव में वह सारी मोह-माया त्यागकर नाम और पुरस्कारों का भूखा हो जाता है।

कई लोगों को पुरस्कार पाने की यह लत अपनी युवावस्था में ही लग जाती है। क्योंकि इन युवाओं ने अपनी निजी ज़िंदगी में कोई ढंग का काम नहीं किया होता, उनकी ज़िंदगी अपनी बनावटी प्रतिभा या अपने छद्म रहन-सहन को स्थापित रखने में ही निकल जाती है।


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