Polo pony / British India 1910

बोधकथा: झूठ बोलने की कला — अभिषेक अवतंस

यह उस ज़माने की कहानी है जब उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य के संस्थापक शेर शाह सूरी का शासन था।

सहसराम शहर में एक हकीम साहब रहते थे। शहर में उनकी एक कपड़े की दुकान थी। उन्हें एक नौकर की सख़्त ज़रूरत थी। काफ़ी दौड़-धूप करने के बाद आखिर उन्हें एक नौकर मिल ही गया। तनख़्वाह वग़ैरह की बात तय हो जाने के बाद उन्होंने नौकर से कहा, “देखो भाई, एक बात और सुन लो। मुझे झूठ बोलने की आदत है। मैं झूठ बोले बिना रह ही नहीं सकता। क्या तुम्हें यह मंज़ूर है? “

नौकर ने कहा – ”झूठ तो मैं भी बोलता हूँ, लेकिन छह महीने में सिर्फ़ एक बार। इसलिए जब मैं आपके रोज़-रोज़ के झूठ बरदाश्त करूँगा तो आपको भी छह महीने में एक बार मुझे झूठ बोलने की इजाज़त देनी होगी।”

“हाँ, हाँ मुझे कोई एतराज़ नहीं है,” हकीम साहब ने कहा। नौकर ने उनके यहाँ काम करना शुरू कर दिया। हकीम साहब को तो भूठ बोलने की आदत थी ही, वे बात-बात में झूठ बोलते रहते। इससे नौकर को ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ता था, लेकिन वह बेचारा कर भी क्या सकता था। मसलन हकीम साहब कहते, घड़े में पानी नहीं है, जबकि घड़ा पानी से भरा होता था। इसी तरह दिन गुज़रते गए। इस बीच हकीम साहब का परिवार कुछ हफ़्तों के लिए अपने गाँव चला गया। कुछ दिनों बाद हकीम साहब ने परिवार की ख़बर लाने के लिए अपने नौकर को गाँव भेज दिया। हकीम साहब के परिवार में उनकी एक बूढ़ी माँ, पत्नी और एक बच्चा था। इनके अलावा उनके यहाँ एक घोड़ा और एक कुत्ता भी था। कुत्ता उन्हें सबसे ज़्यादा प्यारा था। इसलिए जब आठ दिन बाद उनका नौकर लौटकर आया तो सबसे पहले उन्होंने अपने कुते के बारे में ही पूछा, “मेरा कुत्ता तो ठीक है न?” नौकर ने कहा, “बड़ा अच्छा कुत्ता था, लेकिन अफ़सोस कि बेचारा मर गया।”

“मर गया? लेकिन कैसे?” – हकीम साहब ने पूछा।

“बेचारे के गले में घोड़े की हड़ी फंस गई थी, बस।” नौकर ने जवाब दिया। हकीम साहब को बड़ा दु:ख हुआ, लेकिन किया भी क्या जा सकता था। थोड़ी देर बाद बोले, “मेरा घोड़ा तो अच्छी तरह है न?” “अच्छी तरह क्या हुज़ुर, वह तो ईटें ढोते-ढोते मर गया। उसी की हड़ी तो आपके कुत्ते…..”

“ईटें किसने ढुलवाई थीं। मेरे घोड़े से?” नौकर की बात को बीच में ही काटकर गुस्से में चीखते हुए हकीम साहब बोले। “हुजूर, ज़रूरत ही ऐसी थी। आखिर कब्र तो बनवानी थी। भला क्या आपकी माताजी की क़ब्र भी न बनती?” नौकर ने कहा। “तो क्या मेरी माताजी भी चल बसीं ?” हकीम साहब ने आह भरते हुए पूछा। नौकर ने उसी तरह आह भरते हुए कहा, “भला बेटे की बहू के बिना सास कैसे जीवित रह सकती थी?” “क्या?” हकीम साहब की आँखें फटी की फटी रह गई। “तो क्या मेरी बेग़म कहीं भाग गई?”

नौकर ने कहा – “अरे साहब, भागें आपके दुश्मनों की पत्नियाँ, वह क्यों भागती? वह बेचारी तो बेटे की मौत का ग़म न सह सकीं और ख़ुद भी चल बसीं।” यह सुनकर तो जैसे हकीम साहब पर आफ़त का पहाड़ ही टूट पड़ा। पूछा,”मेरे बेटे को आख़िर हुआ क्या था?” ‘होना क्या था मालिक, बस समझ लीजिए कि मौत आ गई थी। वह तो अच्छा-भला खेल रहा था कि बैठे-बैठे मर गया,” नौकर ने कहा।

हकीम साहब अपना सिर थामकर बैठ गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने सोचा कि जब परिवार में कोई रहा ही नहीं तो यह कारोबार और सामान अब किसके लिए रखा जाए। इसलिए उन्होंने थोड़ा-सा पैसा अपने पास रखकर बाक़ी सारा सामान और दौलत पड़ोस के लोगों में बाँट दी और नौकर को साथ लेकर अपने गाँव की ओर चल पड़े।

जब वह अपने घर के पास पहुँचे तो उनका कुत्ता उन्हें देखकर दुम हिलाता हुआ उनके पास आ गया। उन्होंने कहा, “अरे मेरा कुत्ता तो यह रहा।” नौकर ने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। तभी उन्हें अपने घोड़े की हिनहिनाहट सुनाई दी।उन्होंने पाया कि उनका घोड़ा तो अस्तबल में बंधा था। घर के अन्दर पहुँचकर उन्होंने अपनी माँ, पत्नी और बेटे-सभी को वहाँ बैठा पाया। अब तो वह गुस्से से फट पड़े और एक छड़ी लेकर नौकर को मारने दौड़े। नौकर बोला – “पहले आप मेरी बात तो सुनिए।”

हकीम साहब बोले – “अरे, तू सुनाएगा क्या? तूने तो मुझे बरबाद कर दिया। आज मैं तुझे ज़मीन में गाड़ दूँगा।” “ज़मीन में बाद में गाड़िएगा, पहले मेरी शर्त याद कीजिए। क्या छह महीने में एक बार झठ बोलने की बात तय नहीं हुई थी? आप तो दिन में बीस-बीस भूठ बोलें और मैं छः महीने में एक दिन भी भूठ न बोलूँ, यह कहाँ का न्याय है?”

“लेकिन कम्बख़्त, तेरे झूठ ने तो मुझे बरबाद कर दिया। अब तू मेरी आँखों के सामने से चला जा। यह ले अपने पैसे और जा।” नौकर अपनी तनख़्वाह लेकर चल दिया। हकीम साहब ने उस दिन से झूठ न बोलने की कसम खाई।

इसलिए कहते हैं झूठ बोले कौवा काटे।

—– अभिषेक अवतंस

 


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